राम का जन्मभूमि इतिहास


                      Ram mandir ka history

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दोस्तों आप सभी लोग जानते हैं कि अयोध्या में हिंदू मानते हैं वहां 1528 के पहले रामचंद्र जी का मंदिर था लेकिन बाद में मंदिर तोड़कर वहां मस्जिद बना दिया गया मंदिर तोड़कर मस्जिद का रूप देने में कुछ मंदिर के चिन्ह शेष रह गए जैसे

 मस्जिद में मीनार का ना होना।

पक्के परिक्रमा स्थल का होना।

बजु के लिए तालाब ओर कुआं ना होना।

गुंबद वाले दरवाजे में चंदन की लकड़ी लगना जो मंदिर का नियम होता था।

गुंबद के निचले द्वार और अरबी में लेख अल्लाह के किनारे मुङिया भाषा में सीताराम लिखा रहना।

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आपकी जानकारी के लिए बता देते हैं कि यहां मंदिर 84 स्तंभों पर बना हुआ था जो सूर्यवंश के मध्यकालीन राजा ने निर्माण करवाया था आज से 900000 वर्ष पूर्व इस पावन भूमि पर पुरुषोत्तम रामचंद्र जी ने अवतार के रूप में जन्म लिया उनके साथ भारत लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ था ईशा में लगभग लगभग पहेली शताब्दी पूर्व हिंदू कुल के सम्राट विक्रमादित्य द्वितीय ने बड़े परिश्रम से इस मंदिर की जगह विशाल मंदिर बनवाया उस समय भारत वर्ष में चार मंदिर सर्वश्रेष्ठ माने जाते थे।


 1. राम मंदिर अयोध्या

2. कनक भवन मंदिर

3. कश्मीर का सूर्य मंदिर

4. सोमनाथ मंदिर

अयोध्या का इतिहास और राम जन्म भूमि का सच......

सन 1528 में चित्तौड़ के राजा संग्राम सिंह से हारकर बाबर अयोध्या भाग आया उन दिनों जन्मभूमि सिद्ध महात्मा श्यामनन्द जी महाराज के अधिकार क्षेत्र में थी। उनके चर्चे बहुत दूर-दूर तक थे जिसे सुनकर एक मुस्लिम जा फिर काजल अब्बास मूसा उनके शरण में आया महात्मा जी के शिष्य बनकर ख्वाजा कजल अब्बास मूसा ने योग और सिद्धियाँ प्राप्त कर ली और गजल आवास की योग सिद्धि के भी बहुत चर्चे होने लगे।


ये सुनकर जलालशाह नाम का एक फकीर भी महात्मा श्यामनन्द के पास आया और उनका शिष्य बनकर सिद्धियाँ प्राप्त करने लगा जलालशाह एक कट्टर मुसलमान था और उसको एक ही सनक थी हर जगह इस्लाम का आधिपत्य साबित करना।


जलालशाह ने अपने काफिर गुरू की पीठ में छुरा घोंपकर ख्वाजा कजल अब्बास मूसा के साथ मिलकर ये विचार किया की यदि इस मदिर को तोड़ कर मस्जिद बनवा दी जाये तो इस्लाम का परचम हिन्दुस्थान में स्थायी हो जायेगा। धीरे धीरे जलालशाह और ख्वाजा कजल अब्बास मूसा इस साजिश को अंजाम देने की तैयारियों में जुट गए।


सर्वप्रथम जलालशाह और ख्वाजा बाबर के विश्वासपात्र बने और दोनों ने अयोध्या को खुर्द मक्का बनाने के लिए जन्मभूमि के आसपास की जमीनों में बलपूर्वक
मृत मुसलमानों को दफन करना शुरू किया और मीरबाँकी खां के माध्यम से बाबर को उकसाकर मंदिर के विध्वंस का कार्यक्रम बनाया बाबा श्यामनन्द जी अपने मुस्लिम शिष्यों की करतूत देख के बहुत दुखी हुए और अपने निर्णय पर उन्हें बहुत पछतावा हुआ दुखी मन से बाबा श्यामनन्द जी ने रामलला की मूर्तियाँ सरयू नदी में प्रवाहित कर दी और खुद हिमालय की और तपस्या करने चले गए।

अयोध्या का इतिहास जिसे पढ़कर आप रो पड़ेंगे ...

मंदिर के पुजारियों ने मंदिर के अन्य सामान आदि हटा लिए और वे स्वयं मंदिर के द्वार पर रामलला की रक्षा के लिए खड़े हो गए जलालशाह की आज्ञा के अनुसार उन चारो पुजारियों के सर काट लिए गए जिस समय मंदिर को गिराकर मस्जिद बनाने की घोषणा हुई।


उस समय भीटी के राजपूत राजा महताब सिंह बद्री नारायण की यात्रा करने के लिए निकले थे अयोध्या पहुचने पर रास्ते में उन्हें ये खबर मिली तो उन्होंने अपनी यात्रा स्थगित कर दी और अपनी छोटी सेना में रामभक्तों को शामिल कर 1 लाख 50 हजार लोगो के साथ बाबर की सेना के 4 लाख 40 हजार सैनिकों से लोहा लेने निकल पड़े।


रामभक्तों ने सौगंध ले रखी थी रक्त की आखिरी बूंदत लड़ेंगे जब तक प्राण है तब तक मंदिर नहीं गिरने देंगे। रामभक्त वीरता के साथ लड़े 60 दिनों तक घोर संग्राम होता रहा और अंत में राजा महताब सिंह समेत सभी 1 लाख 50 हजार रामभक्त मारे गए। श्रीराम जन्मभूमि रामभक्तों के रक्त से लाल हो गयी इस भीषण कत्लेआम के बाद मीरबांकी ने तोप लगा के मंदिर तोड़कर कर और मस्जिद बना दिया।

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